भू-विरासत स्थल

महत्व तथा संरक्षण

Dr. Bachan Singh,

Director – Abhipray

The Institute of Geography

Jaipur, 9782526093

 

यूनेस्को द्वारा नामित विश्व धरोवर स्थल, ऐतिहासिक संरचनाएं व राष्ट्रीय उद्यान आदि अक्सर शैक्षिक पाठ्यक्रम का हिस्सा होते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से भू-स्मारक एवं इनका संरक्षण तथा यूनेस्को के ग्लोबल जियोपार्क को जनसामान्य द्वारा अब तक ठीक तरह से समझा नहीं जा सका है जिसके कारण लोगों द्वारा इन्हें इतना महत्व नहीं मिलता एवं ये भू-स्मारक मानव द्वारा अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए बिना सोच-समझे नष्ट कर दिए जाते हैं ।

भू-विरासत या भू-गर्भ विरासत स्थलों का महत्व

  • भू-विरासत शब्द का उल्लेख पहली बार 1991 में फ्रांस में आयोजित पहली भू-विरासत संरक्षण पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में किया गया था । शार्पल्स ने 1995 में गतिशील भू-वैज्ञानिक प्रक्रियाओं और भू-विविधता के संरक्षण को शामिल करने के लिए भू-विरासत की मूल अवधारणा को विकसित एवं आधुनिक रूप प्रदान किया ।
  • भू-विरासत स्थल न सिर्फ पृथ्वी के विकास क्रम को जानने के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं बल्कि मानवीय सभ्यता के विकास एवं उत्थान को देखने का एक व्यापक दृष्टिकोण भी प्रदान करते हैं। इसलिए इनका स्व-स्थाने संरक्षण सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि चट्टान और जीवाश्म अपने प्राकृतिक प्रयोगशाला स्थल पर ही अपना सबसे अधिक महत्व रखते हैं। उत्पत्ति स्थल को नष्ट किए जाने पर इनका भू-वैज्ञानिक मूल्य समाप्त हो जाता है ।
  • सांस्कृतिक विरासत स्थलों को काफी हद तक बहाल किया जा सकता है किन्तु, भू-विरासत स्थलों के एक बार नष्ट होने के पश्चात् इन्हें कभी भी पुनर्निर्मित नहीं किया जा सकता; इसलिए इनका संरक्षण करना और भी अधिक महत्वपूर्ण है ।

भू-विरासत संरक्षण के वैश्विक प्रयास           

वैश्विक स्तर पर यूनेस्को द्वारा भू-विरासत स्थलों को संरक्षित करने के लिए जियो पार्क के रूप में चिह्नित किया जाता है। इसके अलावा, विभिन्न देशों द्वारा अपने यहाँ इन स्थलों के संरक्षण के लिए अलग से कानून एवं नियम बनाए हैं। जैसे थाईलैण्ड एवं इण्डोनेशिया ने अपने भू-स्थलों के संरक्षण के लिए विशेष नियम बनाए हैं ।

  • यूनेस्को, जियो पार्क को एकल, एकीकृत भौगोलिक क्षेत्रों के रूप में परिभाषित करता है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय भू-वैज्ञानिक महत्व के स्थलों और परिदृश्यों को संरक्षण, शिक्षा और सतत् विकास की समर्ग अवधारणा के साथ प्रबंधित किया जाता है। दूसरे शब्दों में जियो पार्क स्थानीय लोगों की भागीदारी के साथ-साथ भू-वैज्ञानिक विरासत की रक्षा के लिए निर्मित किए गए स्थल हैं, जिससे इन्हें एक आदर्श पारिस्थितिक पर्यटन स्थल के रूप में निर्मित किया जा सके। जियो पार्क के निर्माण का उद्देश्य भू-वैज्ञानिक विरासत को संरक्षित करने के साथ स्थानीय समुदाय को लाभान्वित करना भी है।
  • ऐसे भू-विरासत स्थल जो अपने भू-वैज्ञानिक, सांस्कृतिक तथा जैविक रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर के हो और स्थानीय निवासियों की उनके संरक्षण एवं विकास में सहभागिता हो उन्हें यूनेस्कों द्वारा ‘ग्लोबल जियो पार्क’ के रूप में मान्यता दी जाती है। जिससे इन स्थलों के संरक्षण से न केवल भू-विज्ञान के संवर्द्धन में मदद मिलती है बल्कि अगनी पीढ़ी को शिक्षित करने, पर्यटन को बढ़ाने और रोजगार के नए अवसर भी सृजित होते हैं। वर्तमान में यूनेस्को ने 44 देशों में 169 स्थलों को जियो पार्क के रूप में मान्यता दी है ।
  • ग्लोबल जियो पार्क नेटवर्क: ग्लोबल जियो पार्क नेटवर्क एक गैर-लाभकारी संगठन है, जिसकी स्थापना 2004 में की गई थी। यूनेस्को जियो पार्क में शामिल होने के लिए इसकी सदस्यता अनिवार्य है। यह एक गतिशील नेटवर्क है, जहाँ सदस्य एक साथ काम करने और सर्वोत्तम अभ्यास के विचार का आदान-प्रदान करने और यूनेस्को ग्लोबल जियो पार्क के सभी उत्पादों और प्रथाओं के गुणवत्ता मानकों को बढ़ाने के लिए आम परियोजनाओं में शामिल होने के लिए प्रसिबद्ध है ।
  • जियो पर्यटन: भू-पर्यटन को पहली बार 1995 में इंग्लैण्ड के थॉमस अल्फ्रेड होज द्वारा परिभाषित किया गया था, जिसके अनुसार भू-पर्यटन भू-वैज्ञानिक आकर्षणों एवं स्थलों से जुड़ा पर्यटन है, जिसमें प्रक्रति द्वारा निर्मित स्थलों जिनका निर्माण पृथ्वी के विकास के साथ हुआ है, ऐसे स्थलों के पर्यटन को प्रोत्साहित किया जाता है ।

भारत में भू-विरासत संरक्षण के प्रयास

प्राकृतिक, भौगोलिक तथा भूगर्भिक विशेषताओं के कारण भारत में विश्व के सर्वाधिक प्रसिद्ध भू-गर्भ स्थल स्थित हैं ।

  • यहाँ आर्कियन युग से लेकर प्लीस्टोसीन युग तक सभी युगों के भू-स्थल पाए जाते हैं। इनमें मध्य तथा दक्षिण भारत में नर्मदा घाटी, गोदावरी प्राणहिता घाटी, मध्य प्रदेश के जबलपुर एवं गुजरात के खेड़ा में स्थित भू-गर्भ स्थल और पूर्वोत्तर भारत में असम एवं मणिपुर, मेघालय की प्राचीन गुफाएँ अपने विकासक्रम में अद्वितीय है। किन्तु, वर्तमान में अनियंत्रित अवैध खनन, बढ़ती जनसंख्या, नगरीकरण एवं इन स्थलों के महत्व का ज्ञान न होने के कारण ये स्थल मानवीय असंवेदनशीलता की भेंट चढ़ते जा रहे हैं ।
  • भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् ही भू-विरासत संरक्षण की अवधारणा को अपना लिया गया था। सर्वप्रथम 1951 में तमिलनाडु के पेराम्बलुर जिलें में धिरूवकाराई, विल्लुपुरम एवं साथनूर के लकड़ी के जीवाश्मों को भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा राष्ट्रीय भू-वैज्ञानिक स्मारक घोषित किया गया था ।
  • हाल में कई और स्मारकों को जोड़ने के परिणामस्वरूप इनकी संख्या 34 हो गई है।
  • भारत में सांस्कृतिक स्मारकों एवं जैविक विविधता वाले क्षेत्रों की रक्षा के लिए प्राचीन स्मारकों और पुरातात्विक स्थल अवशेष (संरक्षण) अधिनियम, 1958 व जैविक विविधता अधिनियम, 2002 को लागू किया है। इसका परिणाम यह है कि भारत में यूनेस्को द्वारा नामित एक भी जियो पार्क स्थल नहीं है।

भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा नामित भू-विरासत संरक्षण स्थल

भारत के 34 अधिसूचित राष्ट्रीय भू-वैज्ञानिक विरासत स्मारक स्थल हैं। जिनकी सुरक्षा हेतु आवश्यक उपाय करने के उत्तरदायित्व भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण तथा राज्य सरकारों के पास हैं।

  भू-विरासत स्थल स्थान
1. ज्वालामुखी विस्तार वाले बैराइट्स कुडप्पा, आंध्र प्रदेश
2. युगांतकारी असंगति चित्तौड़, आंध्र प्रदेश
3. प्राकृतिक भू-वैज्ञानिक मार्क तिरूमाला हिल्स, आंध्र प्रदेश
4. लाल तलछट के टीले विशाखापट्टनम, आंध्र प्रदेश
5. वर्कला क्लिफ सेक्शन तिरूवनंतपुरम, केरल
6. लेटराइट स्थल मलपुरम, केरल
7. राष्ट्रीय जीवाश्म लकड़ी पार्क तिरूचिरापल्ली, तमिलनाडु
8. चारकोकाइट सेंट थामस माउंट मद्रास, तमिलनाडु
9. बैडलैंड्स विद क्रेटेशियस फॉसिल्स पेरम्बलुर, तमिलनाडु
10. जीवाश्म लकड़ी, तिरूवक्कराई उडुपी, तमिलनाडु
11. तलछटी संरचनाएं-एडी मार्किंग पंचमहल, गुजरात
12. सेन्द्रा ग्रेनाइट पाली, राजस्थान
13. बर्र समूह पाली, राजस्थान
14. स्ट्रोमेटोलाइट फॉसिल पार्क उदयपुर, राजस्थान
15. गोस्सान उदयपुर, राजस्थान
16. स्ट्रोमेटोलाइट पार्क, भोजुंडा चित्तौड़गढ़, राजस्थान
17. आंकल फॉसिल वुड पार्क जैसलमेर, राजस्थान
18. किशनगढ़ नेफलाइन सायनाइट अजमेर, राजस्थान
19. वेल्डेड टफ जोधपुर, राजस्थान
20. ग्रेट बाउंड्री फॉल्ट बूंदी, राजस्थान
21. मलानी इग्नियम सुइट-जोधपुर समूह जोधपुर, राजस्थान
22. लोनार झील बुलढाना, महाराष्ट्र
23. लोअर पर्मियन मरीन बेड सरगुआ, छत्तीसगढ़
24. स्तंभकार लावा उडुपी, कर्नाटक
25. पिलो लावा, मरडी हल्ली चित्तदुर्ग, कर्नाटक
26. प्रायद्वीपीय नीस (Gneiss) बेंगलुरू, कर्नाटक
27. पाइरोक्ला स्टिक्स और पिलो लावा कोलार, कर्नाटक
28. शिवालिक फॉसिल पार्क सिरमुर, हिमाचल प्रदेश
29. तकिया लावा, नेमिरा क्योंझर, ओडिशा
30. प्लांट फासिल गोडवाना सीक्वेंस साहिबाबाद, झारखण्ड
31. नागाहिल ओफियोलाइट साइट पुंगारो, नागालैण्ड
32. बक्सा फार्मेशन के डोलोमाइट सिक्किम
33. जावर सीसा-जस्ता खदान राजस्थान
34. रामगढ़ गड्ढा राजस्थान

 

स्कूल व्याख्याता भूगोल, NET/JRF, सहायक प्रोफेसर के लिए online एवं offline बैच उपलब्ध है । डाउनलोड “abhipray” App