रानीखेत बीमारी

Dr. Bachan Singh

The Institute of Geography, Jaipur. Call: 9782526093.

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Historical Background :  पक्षियों में वायरस से फैलने वाले एक रोग का नाम भी ‘रानीखेत’ है। यह बीमारी मुर्गियों, मोर और बत्तखों में फैलती है। हालांकि रानीखेत शहर से इस बीमारी का कोई लेना देना नहीं है। अंग्रेजों ने साजिश के तहत बीमारी का नाम न्यू कैसल से बदलकर रानीखेत रख दिया था। रानीखेत बीमारी का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। इस रोग के वायरस ‘पैरामाइक्सो’ को सबसे पहले वैज्ञानिकों ने वर्ष 1926 में इंग्लैंड के न्यू कैसल शहर में चिन्हित किया था। दुनिया में अब भी इसे न्यू कैसल रोग ही कहा जाता है, लेकिन हिंदुस्तान में बीमारी का नाम ‘रानीखेत’ है। इसकी वजह यह कि वर्ष 1928 में रानीखेत में मुर्गियों पर न्यू कैसल रोग महामारी की तरह फैल गया था। इसकी पुष्टि के बाद ब्रिटिश विज्ञानियों ने चतुराई से हिंदुस्तान में इसी राष्ट्र के सुंदर शहर के नाम पर बीमारी का नाम परिवर्तित कर रानीखेत रख दिया। ताकि कम से कम भारत में इंगलैंड का न्यू कैसल शहर बदनाम न हो। यही दुर्भाग्य है कि, अब भी हिंदुस्तान में जहां भी वायरस फैलता है, वहां इसे ‘रानीखेत’ ही कहा जाता है। उत्तर भारत में इस रोग का फैलाव कम है, पर दक्षिण और पश्चिम भारत में कई बार बीमारी मुर्गियों की जान को महामारी की तरह निगलती है।

रानीखेत रोग (Virulent Newcastle disease (VN)  एक विषाणुजन्य रोग हैं जो घरेलू पक्षियों (जैसे मुर्गी) तथा अनेकों जंगली पक्षी प्रजातियों को प्रभावित करती है। दो तीन दिन में ही पक्षी बहुत कमजोर हो जाते है। इसमें मृत्यु दर भी अधिक होती है। रोग उभरने पर यदि तुरंत ‘रानीखेत एफ-वन’ नामक वैक्सीन दी जाए तो 24 से 48 घंटे में पक्षी की हालत सुधरने लगती है।

उत्तराखंड में रानीखेत एक मशहूर पर्यटन स्थल है।

कहाँ पाई जाती हैं ?

पक्षियों में होती है रानीखेत बीमारी: रानीखेत रोग एक विषाणु जनित वायरल रोग है, यह घातक और संक्रामक होता है। यह न्यू-कैसल रोग विषाणु के कारण होता है, जो पैरामायोक्सोवाइरस परिवार का वायरस है। यह रोग मुख्य रूप से मुर्गी, बत्तख, कोयल, तितर, कबूतर, गिनी, मोर और कौवे सहित अन्य पक्षियों में देखने को मिलता है।

ये है लक्षण

  • खांसी-छींके आना भी लक्षण हैं। दिमाग प्रभावित होता है, जिससे वह लड़खड़ाने लगती हैं और गर्दन लुढ़कने लगती है।
  • सांस नली इन्फेक्टेड होने से सांस लेने में कठिनाई होती है।
  • कभी-कभी इन्हें लकवा भी मार जाता है।
  • दस्त की समस्या हो जाती है और पक्षी दाना खाना कम कर देते हैं।

चर्चा :

  1. ग्रेटर नोएडा में गत वर्ष मोरों में यह रोग देखा गया था ।
  2. जोधपुर के निकट कारपड़ा में प्रवासी पक्षी कुरजां के मरने का सिलसिला मौतों का यह आंकड़ा तीसरे दिन बढ़कर 109 पहुंच गया है।

कुरंजा पक्षी :

डेमोसेले क्रेन मध्य यूरोसाइबेरिया में पाए जाने वाले क्रेन की एक प्रजाति है, जो काला सागर से लेकर मंगोलिया और उत्तर पूर्वी चीन तक है। तुर्की में एक छोटी प्रजनन आबादी भी है। ये सारस प्रवासी पक्षी हैं। प्रवासी पक्षी (डेमोइसेल क्रेन) को स्थानीय भाषा में कुरजां/कुर्जा कहते हैं

ऐसे आती है कुरजां: कुरजां एक खूबसूरत पक्षी है जो सर्दियों में साइबेरिया से ब्लैक समुद्र से लेकर मंगोलिया तक फैले प्रदेश से हिमालय की ऊंचाइयों को पार करता हुआ हमारे देश में आता है। सर्दियां हमारे मैदानों और तालाबों के करीब गुजारने के बाद वापस अपने मूल देश में लौट जाता है। अपने लंबे सफर के दौरान यह पांच से आठ किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ता है। राजस्थान में हर साल लगभग पचास स्थानों पर कुरजां पक्षी आते हैं, लेकिन इनकी सबसे बड़ी संख्या खीचन ( जोधपुर जिला ) ( हाल ही में कोणा गाँव में वृद्धि देखी गई थी ) में ही दिखाई देती है। कुरजां यहां के परिवेश में इतना घुलमिल गया है कि इस पर कई लोकगीत बन चुके है। यहां इनके बच्चे होते है और उनके बड़े होते ही ये उड़ान भर लेते है।

खीचन पक्षी अभयारण्य :

खीचन पक्षी अभयारण्य, राजस्थान के खीचन गाँव में स्थित है । जो प्रवासी पक्षियों का निवास है। इस प्राकृतिक अभयारण्य में तीन प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं जिनमें कुर्जन, करकरा ,कुंच प्रमुख हैं जो दक्षिण पश्चिम यूरोप, काला सागर क्षेत्र, पोलैंड, यूक्रेन, कजाकिस्तान, उत्तर और दक्षिण अफ्रीका और मंगोलिया से प्रवास करके यहाँ आती हैं। अक्टूबर और मार्च के महीने में इन पक्षियों को यहाँ भारी मात्रा  में देखा जा सकता है। ये पक्षी यूरोप की भीषण ठण्ड से बचने के लिए इतनी लम्बी दूरी की यात्रा करते हैं।हर साल बड़ी संख्या में ये प्रवासी पक्षी भारत आते हैं लेकिन इनमें से 4 से 6 हजार पक्षी ही इस अभ्यारण्य में आते हैं । यहाँ आने पक्षी कुर्जन जो कुर कुर की आवाज निकालता है का वजन 4 से 6 किलोग्राम के मध्य होता है और इसकी लम्बाई 3 फीट तक होती है । इनकी विशेष प्रकार की आवाज के कारण ही स्थानीय लोग इसे कुर्जन के नाम से पुकारते हैं । ये पक्षी लम्बी दूरी की यात्रा करने की क्षमता रखता है । ये पक्षी 40 से 60 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार से उड़ता है। कुर्जन में कई और विशेष गुण होते हैं जो इसे अन्य पक्षियों से अलग और उनसे सुन्दर बनाते हैं। खीचन पक्षी अभयारण्य प्रकृति प्रेमियों के बीच काफी लोकप्रिय है और हर साल यहाँ लाखों पर्यटक इन पक्षियों को देखने के लिए इस अभयारण्य में आते हैं।

कुरजा राजस्थानी लोक गीत : (कुरजां ऐ म्हारा भंवर मिलाय दे ऐ)

इस लोक गीत में नवविवाहिता के द्वारा कुरजा पक्षी को माध्यम बनाकर अपने विरह का चित्रण किया गया है। कुरजा पक्षी, डेमोइसेल क्रेन, साइबेरिया से हर वर्ष भारत में आते हैं। इस लोक गीत में नायिका अपने विरह का चित्रण करती है। रोजगार की तलाश में पुरुषों को अपना देस छोडकर अन्य स्थानों पर जाना पड़ता था और कुछ को युद्ध आदि के लिए अपना देश छोड़ना पड़ता था, साथ ही यातायात के साधन भी इतने नहीं थे की तुरंत ही वापस लौट आयें । यात्रा में ही कई कई महीनों का समय बीत जाया करता था । ऐसी अवस्था में स्त्रियां विरह की अग्नि में तड़पती हैं और कुरजा पक्षी को अनपे प्रिय को खबर देने के लिए कहती हैं।

सूती थी रंग महल में,

सूती ने आयो रे जंजाळ,

सुपनां रे बैरी झूठो क्यों आयो रे,

कुरजां तू म्हारी बैरड़ी ए, सांभळ म्हारी बात,

ढोला तन्ने ओळमां भेजूं थारे लार,

कुरजां ए म्हारो भँवर मिला देनी ए,

सपनों जगाई आधी रात में,

तन्ने मैं बताऊँ मन की बात,

कुरजां ऐ म्हारा भंवर मिलाय दे ऐ,

संदेशो म्हारे पिया ने पुगा दयो ऐ,

 Dr. Bachan Singh, Abhipray, The Institute of Geography, Jaipur.